खेल भी नशा है...अवसाद से निकलना है तो खेल मैदान में जाओ- बबीता फोगाट

भीलवाड़ा.

राष्ट्रमंडल खेल-2014 में कुश्ती में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहलवान व भाजपा नेता बबीता फोगाट ने मंगलवार को यहां कहा कि कुश्ती ने उन्हें बढिया अनुभव दिए। बेटियां अब यह मिथक तोड़ रही है कि कुश्ती पुरुषों का खेल है। लड़कियों को हर क्षेत्र से जोड़ना जरूरी है। कुश्ती को आगे ले जाने में लड़कियों का अहम योगदान है।

दंगल गर्ल बबीता मंगलवार को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के 58वें प्रांत अधिवेशन में हिस्सा लेने भीलवाड़ा आई थीं। बबीता ने राजस्थान में भर्ती परीक्षाओं के पेपर लगातार आउट होने से लेकर युवाओं के अवसाद में आने जैसे कई सवालों के जवाब मीडिया को दिए।

फोगाट ने कहा, बार-बार पेपर आउट होना राज्य सरकार की नाकामी है। सरकार व प्रशासन के इंतजाम की पोल खुलती है। पेपर लीक के चलते रद्द हुई परीक्षा मेहनत करने वाले अभ्यर्थी को अवसाद में ले जा सकती है, जो चिंताजनक है। राज्य सरकार भर्ती परीक्षाओं में पेपर की समुचित सुरक्षा नहीं कर पाई तो इस बार जनता उसे ठीक कर देगी। युवाओं के अवसाद के चलते खुदकुशी करने के सवाल पर बबीता ने कहा, कोई भी युवा अपनी मेहनत को खराब नहीं करना चाहता है।

मेहनत पर पानी फिरने का आत्मघाती कदम उठाता है। आज का युवा धैर्य खो चुका है। एकल परिवार होते जा रहे हैं। ऐसे में युवाओं को अवसाद से निकालने के प्रयास नहीं हो पाते।खिलाड़ी की युवाओं को सीख

बबीता ने कहा कि अवसाद से निकलने का सबसे अच्छा माध्यम खेल है। अवसाद या हताश होने पर युवाओं को खेल मैदान में चले जाना चाहिए। वहां अवसाद अपने आप समाप्त हो जाएगा। खेल भी एक तरह का नशा है, जो युवाओं को अवसाद से दूर ले जाएगा। हर युवा को दिल खोलकर खेलना चाहिए।

पापा की परी नहीं, शेरनी बने बेटियां-

इससे पहले विद्यार्थी परिषद के प्रांतीय अधिवेशन में फोगाट ने कहा कि युवाओं को नशा ही करना है तो तिरंगे का करे। नशा मेहनत व खेल का करना चाहिए। बीमारी भी आएगी तो सज धज के आएगी। उन्होंने आजादी का मतलब अपने पैरों पर खड़ा होना बताया। कहा-राष्ट्र निर्माण में हर लड़की अपने साथ एक लड़की को जोड़े। घर से बाहर निकलते समय कोई कुछ करे तो पहले कुछ बोलना मत, और बाद में उसे छोड़ना मत।

युवाओं को अपनी सोच में बदलाव करने की जरूरत है। कुछ युवा अफजल व कसाब को अपनी प्रेरणा मानते है। यह दुख की बात है। सनातन धर्म किसी का बनाया हुआ नहीं है। यह सूरज-चांद के समय से चलता आ रहा है। वर्ष 2014 से पहले देश को कोई चला नहीं रहा था भगवान भरोसे चल रहा था। युवाओं में विजन होना चाहिए। विजन नहीं होगा तो राहुल गांधी की तरह बोलते रहेंगे। लड़किया पापा की परी न बनकर शेरनी बनें।



source https://www.patrika.com/bhilwara-news/if-you-want-to-get-out-of-depression-then-go-to-the-sports-ground-7945130/

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