दुनिया में नित्यता-अनित्यता का क्रम सदैव चलता है

भीलवाड़ा।
आचार्य महाश्रमण ने कहा कि दुनिया में नित्यता और अनित्यता का क्रम सदैव चलता रहता है। स्थिरता के बिना परिवर्तनशीलता नहीं है और परिवर्तनशीलता के बिना स्थिरता नहीं है। एक स्थिति से दूसरी स्थिति में जाना परिणमन कहलाता है। ये जीव और अजीव दोनों में होता है। जैन दर्शन के अनुसार भावों में परिवर्तनशीलता आती है, कर्मों का उदय होता है जिसके फलस्वरूप जीव का परिणामांतर होता रहता है।
आचार्य ने कहा कि जीव परिणाम के कुछ प्रकार है। जैसे गति, इंद्रिय, कषाय, लेश्या, योग, उपयोग, चारित्र, वेद आदि। इनमें से कुछ त्याज्य है तो कुछ उपादेय है। कषाय परिणाम त्याज्य होता है। लेश्या, योग शुभ अशुभ दोनों रूप में होते है लेकिन फिर भी अंतिम समय में ये भी त्याज्य होते है। केवल ज्ञान की उच्च भूमिका में आने के बाद जीव सब चीजों से ऊपर पहुंच जाता है। व्यक्ति का चारित्र परिणाम उन्नत रहे, ऐसा ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास रहे यह काम्य है। कार्यक्रम में साध्वी योगप्रभा ने गीतिका की प्रस्तुति दी। चंदा बाबेल, दर्श चोरडिय़ा ने विचार रखे। आचार्य ने सुरेश चंद्र बोरदिया को 25 की तपस्या में 30 मासखमण की तपस्या का प्रत्याख्यान करवाया।
तेरापंथ महिला मंडल कार्यकर्ता सम्मेलन
महाश्रमण सभागार में साध्वी कल्पलता की प्रेरणा से तेरापंथ महिला मंडल कार्यकर्ता सम्मेलन हुआ। साध्वी शारद यशा ने कहा कि व्यक्ति अपने भीतर छिपी प्रतिभा को प्रकट करने, दूसरों के लिए कुछ अर्पण करने और स्वयं की पहचान के लिए कार्यकर्ता बनना चाहता है। अभा तेरापंथ महिला मंडल अध्यक्ष पुष्पा बैद, महामंत्री तरुणा बोहरा, राष्ट्रीय सहमंत्री नीतू ओस्तवाल, मंडल अध्यक्ष मीना बाबेल ने सम्बोधित किया। लता जैन, विमला नाहटा, हेमलता जैन उपस्थित रही।



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