टिप्पणी : विवादों का न्यास
जयप्रकाश सिंह
भीलवाड़ा के नगर विकास न्यास को विवादों का न्यास कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। प्रदेश के सम्पन्न न्यासों में शुमार भीलवाड़ा के नगर विकास न्यास में आए दिन विवाद आम बात है। कभी निर्माण कार्यों तो कभी फैसलों पर अंगुलियां उठती रही है। छह माह से ज्यादा समय तक कार्यवाहक सचिव के भरोसे यहां कामकाज होता रहा। इस दौरान कई विवादित निर्णय हुए। इन निर्णयों को लेकर पत्रिका में खबरें छपने के बाद न्यास के जिम्मेदार अधिकारी जागे और उन्होंने कई आदेशों को निरस्त कर दिया तो कुछ पर नए सिरे से कार्यवाही शुरू कर दी। कई मामलों में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने भी जांच शुरू कर दी।
न्यास की ओर से हरणीखुर्द में पिछले पांच साल से मुख्यमंत्री जन आवास योजना के तहत आवास बन रहे हैं। बीस करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि खर्च हो चुकी है, लेकिन अब तक एक भी आवास रहने लायक नहीं बना। ढाई सौ से ज्यादा लोग राशि जमा कराने के बाद कब्जे का इंतजार कर रहे हैं। तीन दिन पूर्व खुद न्यास सचिव ने मौका मुआयना किया और गुणवत्ता को लेकर नाराजगी जताई। सवाल यह है कि इतने दिन से न्यास के अधिकारी और अभियन्ता क्या कर रहे थे। गुणवत्ता को लेकर उन्होंने क्या निगरानी की। कार्य की धीमी गति को लेकर ठेकेदार पर क्यों नहीं कार्रवाई की। ठेकेदार पर मेहरबानी से जाहिर होता है कि सम्बंधित अभियन्ताओं की भी इसमें मिलीभगत है। कलक्ट्रेट में हुए निर्माण कार्य पर खुद न्यास प्रशासक और जिला कलक्टर नाराजगी जता चुके हैं। न्यास की निरस्त औद्योगिक नगर योजना के लिए आवंटित चार करोड़ रुपए निजी कॉलोनाइजर को उपकृत करने के लिए उसकी कॉलोनी में विकास कार्य पर खर्च कर दिए। इसका खुलासा होने के बाद एसीबी ने जांच शुरू करते हुए मामले की सारा रिकार्ड तलब कर लिया है।
पिछले साल न्यास के ठेकेदार से रिश्वत लेते हुए एक साथ तीन अभियन्ता रंगे हाथों पकड़े जा चुके हैं। राजनीतिक संरक्षण के चलते यहां बरसों से जमे अभियन्ताओं की कारगुजारी जगजाहिर है। उनके बीच वर्चस्व की लड़ाई का नुकसान आमजन भुगत रहा है। न्यास में पिछले दिनों बाहर से आए अधीक्षण अभियन्ता ने कार्य में सुधार और पारदर्शिता लाने की कोशिश की तो उनके मातहतों को यह नहीं सुहाया। राजनीतिक दबाव डालकर अधीक्षण अभियन्ता को एपीओ करवा दिया गया, लेकिन अधीक्षण अभियन्ता इसके खिलाफ उच्च न्यायालय से स्टे ले आए। स्टे के बावजूद वे वापस कार्यभार संभालने के लिए चक्कर काटते रहे। स्थाई सचिव नहीं मिलने पर पिछले छह माह के दौरान न्यास में लगे कार्यवाहक सचिव को लेकर भी विवाद रहा। उनके कई निर्णय भी विवादित रहे। न्यास में कई वरिष्ठ अधिकारियों के लिंक अधिकारी बनाकर उनसे मनचाहे फैसलों पर मुहर लगाने की कोशिश की गई। पत्रिका ने इन फैसलों पर सवाल उठाए तो उन्हें आनन फानन में बदल दिया गया।
शहर के विकास के उद्देश्य से ही नगर विकास न्यास का गठन किया गया। ऐसे में इसके अधिकारियों की महत्ती जिम्मेदारी है कि ठेकेदारों के बजाय आमजन के हित में योजनाएं बने और काम हो। योजनाओं का पूरा लाभ आमजन को मिले। सरकारी धन का पूरा सदुपयोग हो। कार्यों में गुणवत्ता बनी रही, वरना आमजन के साथ छलावा होता रहेगा और भ्रष्ट कारिन्दे व ठेकेदार मौज करते रहेंगे।
source https://www.patrika.com/bhilwara-news/comment-disputes-trust-in-bhilwara-7032713/
Comments
Post a Comment